जी करता हैं…

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जी करता हैं, गुलाल बन जाऊँ..
चीखता-चिल्लाता बवाल बन जाऊँ..!
दूरीयों, मजबूरीयोंसे अलग..
उन रेशमी हाथोंका रुमाल बन जाऊँ..!
जिंदगी क्यूँ सिखाए मुझे उसके मायने..
आज खुद जवाब, खुद सवाल बन जाऊँ..!
पीछे घनी धुंध, आगे गहरा कुऑं..
डर को डरानेवाली मिसाल बन जाऊँ..!
कभी किशन बन बन्सी बजाऊं..
कभी गाय, तो कभी गोपाल बन जाऊँ..!
हो जाऊँ आज मैं परोंसे भी हलका..
मस्तीमें उडता खयाल बन जाऊँ..!
आखिर कब तक उठाए गैरोंके बोझ..
आज खुद के बोझ का हमाल बन जाऊँ..!
जी करता हैं.. जी करता हैं..!

– © विक्रम.

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