Category Archives: Poetry

सफ़र नया..!

जेबें तो साफ़ हैपर आँखों में ख़्वाब हैजुनूँ के क़ाफ़िलों कीआदत ख़राब हैछोड़ी है मँजिलेरस्तों के वास्तेखोने-पाने का यहभी अपना हिसाब़ हैडगर नयी है, जिगर वही हैऔर है, सफ़र नया! अपने साथ में है कुछ नए फासलेबंदिशें भी राह में खुल के साँस लेपंछी है, उड गएमोडों पे, मुड गएराहों में जो मिलाहम उस से जुड गएडगर नयी है, जिगर वही हैऔर है, सफ़र नया! सडक जहा पर ले जाएअपना भी वहीं पे ही दिल आएरुकना हम को सताएके डर को तोडो, छोडो, दौडो,दिन में, या रात मेंतूफ़ाँ, बरसात मेंरस्तों के बादशाहहम चलते रुबाब सेडगर नयी है, जिगर वही हैऔर …Read more »

जलने दे..

जलने दे जलने दे तेरी आँच से जलने देगलने दे गलने दे मुझे काँच सा गलने देमैं हूँ महताब का जायादे दे तेरी धूप मुझेतू सच और जग है मायाले ले मेरी छाँव तुझे कभी फोन पे उँगलियाँ भी मेरे नाम पे रुकती तो होंगीभरमाती तो होंगी कुछ आहटेंअश्क़ों की बदलियाँ भी तेरे ग़ालों पे झुकती तो होंगीधुल जाती तो होंगी मुस्काहटेंबोल..सजना तू ने क्या पायारख के तेरी धूप तुझेग़म सच और राहत मायासमझा है खूब मुझे जलने दे.. — © विक्रम श्रीराम एडके (एक संगीतकार द्वारा बनायी गयी धुन पर लिखा था यह गीत। किसी भी गीतकार के अधिकांश …Read more »

हसरत

जिस्मों की पहेलियों कोसाँसों की सहेलीयों कोसाँसों से सुलझा दो तुम, खुल जाऊँगी!गिरहा खुल जाऊँगी!! मैं सदियों से खोई पडी हूँतारों के भुलभुलैया मेंयुगों से वहीं खडी हूँसमय के तालतलैया मेंखाली सी हवेलीयों कोसाँसों की सहेलीयों कोसाँसों से सुलगा दो तुम, भर आऊँगी!पूरी भर आऊँगी!! मैं मौन की एक नदी हूँशोर भरी इस दुनिया मेंहै मेरा कोई घाट कहाँछोर नहीं इस दुनिया मेंकाई जमी हथेलियों कोसाँसों की सहेलीयों कोसाँसों से पिघला दो तुम, घुल जाऊँगी!तुझ में घुल जाऊँगी!! — © विक्रम श्रीराम एडके[www.vikramedkde.com । चित्र: प्रातिनिधिक । चित्रश्रेय: मूल चित्रकार को । चित्रस्रोत: इंटरनेट ।]

रुणुझुणू वारा

२०१६ मध्ये माझ्याकडे एक मराठी चित्रपट-दिग्दर्शक आला होता, ‘मी एक रोमँटिक चित्रपट करतोय त्यासाठी गाणं लिहून द्याल का’ विचारत. मी त्याला चालीबद्दल विचारले. तो म्हणाला की, ‘तुम्ही लिहा आपले संगीतकार चाल लावतील’. असे म्हणून त्याने मराठीतल्या एका बरे नाव असलेल्या संगीतकाराचे नाव घेतले. म्हणजे गाणं आधी लिहून मग चाल लावली जाणार होती. प्रासंगिक गीत असल्यामुळे मी दिग्दर्शकाकडून संहिता मागवून घेतली. त्या तथाकथित रोमँटिक प्रसंगावर गाणे लिहिले आणि संगीतकाराला पाठवून दिले. दुसऱ्या दिवशी सकाळीच मला संगीतकाराचा फोन आला. “हे काय लिहिलेय तुम्ही”? “गाणे”, मी. “हे असं नकोय आपल्याला”. “असं नकोय, मग कसं हवंय”? त्यावर त्याने वापरलेले वाक्य अक्षरशः असे होते – …Read more »

क्रिएटिविटी की बूँदें

परेशानियाँ बो के जब उधेड़ोगे नीन्दें, तब जा कर बरसती है दो-चार क्रिएटिविटी की बूँदें! टप्प कर के गिरती है कुछ, और कुछ कँकर सी सटाक लगती है, अाधे जल रहे दिल से लग के भाँप भी बन जाती है कोई! एक-आध बच भी जाती है कुछ, तो वह भी हम मोबाईल, लैपटाप या टिवी के पराश्राव्य शोर से मार देते है! और फिरते रहते है भौकाल बन के बाकी बचा कुछ-एक हज़ारवाँ भाग सहलाते हुए! कि देखो, मैं ने कितना ऑफबीट कर दिया यह! अरे भाई, देने वाले ने क्या दिया था, तू ने कितना लिया है! छप्पर तो …Read more »

वादा

(धुन: इरऽविन्ग तीऽवाय. फिल्म: 96. संगीत: Govind Vasantha) ************************************ हक़ीक़त से कैसे साझा करे नयनों में तैरे सपने समय से क्या हम वादा करे दो ही मिले थे लम्हें रैना ले के चाँद के निशाँ बहती चली है और ही दिशा भोर ने है उस का आँचल यह भरा चाँद के है हिस्से में काली ख़ला फिर भी क्यूँ ना आह वह भरे हक़ीक़त से कैसे साझा करे नयनों में तैरे सपने एक आँच थी मेरा जीवन पिघला गयी एक बाँसुरी नयी सरगम सिखला गयी यूँ तो उम्र भर मैं थी भागी जिस के लिए थी वह कस्तुरी मेरे दो …Read more »

वृत्तावर्त

सुरज ढलता है तो, और जग में जलता है वह, अस्त-उदय खेल है यह भेद बुद्धी का! मृत्यू ध्रुव है तो, जन्म भी तो ध्रुव होगा, जनन-मरण चक्र है यह भेद दृष्टी का! अमावस के पीछे पौर्णिमा, कालिमा के आगे रक्तिमा, वृत्तावर्त से बना है भवसमुद्र सारा! धानानानानानाना..!! अधर्म के मार्ग पुष्प उगते, धर्ममार्गपर है शूल चुभते! पाप को चाहे यदि तजना, पुण्य की भी रस्सी क्यूँ ना छोडे! पाप क्या क्या धर्म (मुद्रा), पुण्य क्या अधर्म (के आयाम), एक को हम जो दे (मिटा किंतु), मुद्रा तो तब भी घूमेगी ना! धानानानानानाना..!! — © विक्रम श्रीराम एडके । ========================= …Read more »

लढ मित्रा

डरतो कश्याला तू लढ मित्रा लढत्याची दासी धरणी मित्रा दु:ख तितुके माया हो सूर्य गिळतो छाया हो टाकीच्या घावांमधुनी देव बनते काया हो वेदना रे वीराला लिहिली असे जन्माला वेणांची करुनि गीते गा तू आपुल्या कर्माला तुझिया रे कष्टांनी हो अवनिला आधारा तू बांध माथ्यावरती जखमांचा हा भारा व्रण हे जरी भीषण रे युद्ध वीरा भूषण रे तू पार्थ तुझा तू कृष्ण तुझा तू तुझी गीता रे होतील कविता ह्या तलवारी देतील अंधारा त्या ललकारी डरतो कश्याला तू लढ मित्रा लढत्याची दासी धरणी मित्रा गंध मातीचा येण्या चार महिने ताप हो तपाचे फळ मिळण्या पाहावी लागते वाट हो शंभरवेळा पडताना …Read more »

कधी कधी

कधी कधी रात्र विरताना, दिवस उगवायाचा असतो अजून, सूर्य उमलायाचा असतो अजून! चंद्राचं इंधन पुरतं संपलेलं नसतं आणि लुकलुकत असतात ताऱ्यांचे लाखो पलिते, क्षितिजचुंबी गगनाच्या लाक्षागृहात! कुणीतरी साखरझोपेत कूस बदलतो, कुणाची मिठी घट्ट होते कुठे कुरकुरत असतो पंखा तर कुठे स्वप्नांची होडी पैल होते! अश्या एकाकी अंधारवेळी मी टक्क जागा असतो, कधी सुटलेले हात आठवत, तर कधी मिटलेली दारे साठवत! तू विचारलं होतंस, ‘विसरणार तर नाहीस ना मला’ आणि ‘मला विसर, माझं लग्न ठरलंय’, हेदेखील तूच म्हणाली होतीस! मला तेव्हाही उत्तर सुचलं नव्हतं, मला तेव्हाही उत्तर सुचलं नाही! त्या एकांत प्रहरी मात्र, सुचत राहातात सारीच न दिलेली उत्तरे, आणि त्यावरच्या …Read more »

गुलज़ार

नज़्म पूरे जोबन पे थीनूर के कोहरे बहते थेइश्क़ तो तब भी था मगरवह और जगह रहते थे चलते-बहते एक रातसय्यार टकराया चाँद सेनूर मिला नज़्म को जा करअब्रों की दिवार फाँद के सागर डोल गया था उस दमतारे सारे उफनने लगे थेदूर कहीं कोहसारों मेंख़्वाब पकने बनने लगे थे वक़्त थम गया था उस वक़्तनज़्म-ओ-नूर का दीदार हुआइक हलचल सी हुई उजालों मेंइक नाम उठा ‘गुलज़ार’ हुआ — © विक्रम श्रीराम एडकेGulzar #HBDGulzarSaab

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