Category Archives: Poetry

‘टेनेट’ – उलट्या काळाचा सुलटा भविष्यवेध!

चलचित्र बनवणं आणि चित्रपट बनवणं, यात एक मूलभूत फरक असतो. एक उदाहरण देतो. समजा की, चलचित्र म्हणजे कविता आहे. सुरुवातीपासून शेवटपर्यंत काहीतरी एक विधान करणारी. चित्रपट मात्र कवितेसारखा नसतो. चित्रपट म्हणजे सूक्त असते. त्याची प्रत्येक चौकट ही एखाद्या ऋचेसारखी असते, स्वयमेव काही कथा सांगणारी. आणि या चौकटी जेव्हा एकत्र येतात तेव्हा अनेक ऋचा मिळून जसे एक परिपूर्ण आणि काहीतरी गूढ उलगडून सांगावे तसा अर्थ सांगणारे सूक्त बनते, तसा चित्रपट सबंध पाहिला तर चौकटींनी बनलेली परंतु चौकटींपेक्षा भिन्न अशी कथा उलगडते. हा निकष लावला तर मला सांगा, जगात खरोखर किती ‘चित्रपट’ बनतात! इतकी कठोर परीक्षा घेतली तर जगातील काही भलेभले आणि …Read more »

कर्तव्य के पथ पर

उत्कर्ष मिलेगा, अपकर्ष भी!कर्तव्य के पथ पर,वेदनाएं मिलेंगी, हर्ष भी! कंकर छेदेंगे पग तुम्हारे,जिह्वाएं ह्रदय भेदेंगी!पंक उछलेगा चरित्र पर,धैर्य कि अंगुली छूटेगी!किंतु रे धीर, तुम चलते रहना,तुम चलते रहना अविचल,जब तक कि गंतव्य ना मिले,चाहे मार्ग में यश मिले संघर्ष भी!! तुम चलते रहना निरलस, पथ में शत-शत मोड आएंगे,आप्त तुम्हारे, साथ तुम्हारा, क्षण में छोड जाएंगे!न ढलेगी कोई रात्रि जब होगी नयनों से वृष्टि नहीं,सम्भव है, कि तुम्हें लगे, भगवान की तुम पर दृष्टि नहीं!तब सोच समझ के करना दोनों, क्रोध भी, मर्ष भी,और अथक चलते रहना धीर,जब तक कि गंतव्य ना मिले,चाहे मार्ग में यश मिले, संघर्ष भी!! …Read more »

मौन के महाद्वीप

निशा थीचन्द्रमा थाझील के तीर परतुम थी, मैं थाकिन्तु दोनों के मध्यतब भी थे मौन के द्वीपकुछ नि:श्वासों की दूरी परऔर कुछ शब्दों के समीपवे द्वीप यदि लाँघ पातेसंकोच के बाँध यदि तोड पातेकथा कुछ अन्य मोड लेतीकविता विरह की उँगली छोड देतीविचारों-विचारों में रात्रि ढल गयीअधरों तक आयी बात, टल गयीनिशा, चन्द्रमा तथा झीलतीनों अब भी वहीं हैनहीं है तो केवल मैं और तुमया है कदाचित किसी और समयधारा मेंइस आयाम में तो मौन के द्वीप सम्भवत:अब महाद्वीप बन गए है — © विक्रम श्रीराम एडके

सफ़र नया..!

जेबें तो साफ़ हैपर आँखों में ख़्वाब हैजुनूँ के क़ाफ़िलों कीआदत ख़राब हैछोड़ी है मँजिलेरस्तों के वास्तेखोने-पाने का यहभी अपना हिसाब़ हैडगर नयी है, जिगर वही हैऔर है, सफ़र नया! अपने साथ में है कुछ नए फासलेबंदिशें भी राह में खुल के साँस लेपंछी है, उड गएमोडों पे, मुड गएराहों में जो मिलाहम उस से जुड गएडगर नयी है, जिगर वही हैऔर है, सफ़र नया! सडक जहा पर ले जाएअपना भी वहीं पे ही दिल आएरुकना हम को सताएके डर को तोडो, छोडो, दौडो,दिन में, या रात मेंतूफ़ाँ, बरसात मेंरस्तों के बादशाहहम चलते रुबाब सेडगर नयी है, जिगर वही हैऔर …Read more »

जलने दे..

जलने दे जलने दे तेरी आँच से जलने देगलने दे गलने दे मुझे काँच सा गलने देमैं हूँ महताब का जायादे दे तेरी धूप मुझेतू सच और जग है मायाले ले मेरी छाँव तुझे कभी फोन पे उँगलियाँ भी मेरे नाम पे रुकती तो होंगीभरमाती तो होंगी कुछ आहटेंअश्क़ों की बदलियाँ भी तेरे ग़ालों पे झुकती तो होंगीधुल जाती तो होंगी मुस्काहटेंबोल..सजना तू ने क्या पायारख के तेरी धूप तुझेग़म सच और राहत मायासमझा है खूब मुझे जलने दे.. — © विक्रम श्रीराम एडके (एक संगीतकार द्वारा बनायी गयी धुन पर लिखा था यह गीत। किसी भी गीतकार के अधिकांश …Read more »

हसरत

जिस्मों की पहेलियों कोसाँसों की सहेलीयों कोसाँसों से सुलझा दो तुम, खुल जाऊँगी!गिरहा खुल जाऊँगी!! मैं सदियों से खोई पडी हूँतारों के भुलभुलैया मेंयुगों से वहीं खडी हूँसमय के तालतलैया मेंखाली सी हवेलीयों कोसाँसों की सहेलीयों कोसाँसों से सुलगा दो तुम, भर आऊँगी!पूरी भर आऊँगी!! मैं मौन की एक नदी हूँशोर भरी इस दुनिया मेंहै मेरा कोई घाट कहाँछोर नहीं इस दुनिया मेंकाई जमी हथेलियों कोसाँसों की सहेलीयों कोसाँसों से पिघला दो तुम, घुल जाऊँगी!तुझ में घुल जाऊँगी!! — © विक्रम श्रीराम एडके[www.vikramedkde.com । चित्र: प्रातिनिधिक । चित्रश्रेय: मूल चित्रकार को । चित्रस्रोत: इंटरनेट ।]

रुणुझुणू वारा

२०१६ मध्ये माझ्याकडे एक मराठी चित्रपट-दिग्दर्शक आला होता, ‘मी एक रोमँटिक चित्रपट करतोय त्यासाठी गाणं लिहून द्याल का’ विचारत. मी त्याला चालीबद्दल विचारले. तो म्हणाला की, ‘तुम्ही लिहा आपले संगीतकार चाल लावतील’. असे म्हणून त्याने मराठीतल्या एका बरे नाव असलेल्या संगीतकाराचे नाव घेतले. म्हणजे गाणं आधी लिहून मग चाल लावली जाणार होती. प्रासंगिक गीत असल्यामुळे मी दिग्दर्शकाकडून संहिता मागवून घेतली. त्या तथाकथित रोमँटिक प्रसंगावर गाणे लिहिले आणि संगीतकाराला पाठवून दिले. दुसऱ्या दिवशी सकाळीच मला संगीतकाराचा फोन आला. “हे काय लिहिलेय तुम्ही”? “गाणे”, मी. “हे असं नकोय आपल्याला”. “असं नकोय, मग कसं हवंय”? त्यावर त्याने वापरलेले वाक्य अक्षरशः असे होते – …Read more »

क्रिएटिविटी की बूँदें

परेशानियाँ बो के जब उधेड़ोगे नीन्दें, तब जा कर बरसती है दो-चार क्रिएटिविटी की बूँदें! टप्प कर के गिरती है कुछ, और कुछ कँकर सी सटाक लगती है, अाधे जल रहे दिल से लग के भाँप भी बन जाती है कोई! एक-आध बच भी जाती है कुछ, तो वह भी हम मोबाईल, लैपटाप या टिवी के पराश्राव्य शोर से मार देते है! और फिरते रहते है भौकाल बन के बाकी बचा कुछ-एक हज़ारवाँ भाग सहलाते हुए! कि देखो, मैं ने कितना ऑफबीट कर दिया यह! अरे भाई, देने वाले ने क्या दिया था, तू ने कितना लिया है! छप्पर तो …Read more »

वादा

(धुन: इरऽविन्ग तीऽवाय. फिल्म: 96. संगीत: Govind Vasantha) ************************************ हक़ीक़त से कैसे साझा करे नयनों में तैरे सपने समय से क्या हम वादा करे दो ही मिले थे लम्हें रैना ले के चाँद के निशाँ बहती चली है और ही दिशा भोर ने है उस का आँचल यह भरा चाँद के है हिस्से में काली ख़ला फिर भी क्यूँ ना आह वह भरे हक़ीक़त से कैसे साझा करे नयनों में तैरे सपने एक आँच थी मेरा जीवन पिघला गयी एक बाँसुरी नयी सरगम सिखला गयी यूँ तो उम्र भर मैं थी भागी जिस के लिए थी वह कस्तुरी मेरे दो …Read more »

वृत्तावर्त

सुरज ढलता है तो, और जग में जलता है वह, अस्त-उदय खेल है यह भेद बुद्धी का! मृत्यू ध्रुव है तो, जन्म भी तो ध्रुव होगा, जनन-मरण चक्र है यह भेद दृष्टी का! अमावस के पीछे पौर्णिमा, कालिमा के आगे रक्तिमा, वृत्तावर्त से बना है भवसमुद्र सारा! धानानानानानाना..!! अधर्म के मार्ग पुष्प उगते, धर्ममार्गपर है शूल चुभते! पाप को चाहे यदि तजना, पुण्य की भी रस्सी क्यूँ ना छोडे! पाप क्या क्या धर्म (मुद्रा), पुण्य क्या अधर्म (के आयाम), एक को हम जो दे (मिटा किंतु), मुद्रा तो तब भी घूमेगी ना! धानानानानानाना..!! — © विक्रम श्रीराम एडके । ========================= …Read more »