Category Archives: Poetry

ख़याल

कई दफ़ा खयाल, बयाँसे ज्यादा खुबसुरत होते हैं, और हर इक बयाँ के पीछे होते हैं सैकडों मुर्दा ख़याल! नज़्मोंकी तआरीफ करते हैं लोग, ख़यालोंके नआले कौन सुनता हैं? फूटे अल्फ़ाज़, चीखते ख़यालोंसे ज्यादा भाते हैं शायद!! ऐ मेरे ख़याल, ऐ मेरी कल्पना.. इक तुम्हींपे तो लिखता हूँ मैं नज़्में, बयाँ करता हूँ तुम्हारा हुस्न, जो पकडमें नहीं आता, फिसल जाता हैं.. सच कहता हूँ.. मेरी नज़्मोंसे कहीं ज्यादा खुबसूरत हो तुम, जँचती हैं वह तुमसे! इक तुम्हाराही तो आसरा हैं उन्हें.. वरना नज़्मोंका क्या हैं.. उडते परीन्दे हैं महज, ना कोई ठिकाना – ना कोई आशियाँ..! — © विक्रम.

वैनतेय

काल तू मला मारलं होतंस ना, पाहा आज मी पुन्हा उभा राहिलोय! तू करुन टाकलं होतंस छिन्नविच्छिन्न मला, मी ते सगळे तुकडे गोळा केले आणि सांधलंय बघ हे देहभर आभाळ! आजपासून इथे बरसतील केवळ असण्याचेच मेघ, होय मी आहे अजूनही, मी आहे आणि मी राहाणार, मी असलो आणि नसलो तरीही नेहमीच तुझ्या अपराधगंडाने सडलेल्या मनात, मी राहाणार! कारण.. कारण, तूच तर होतास ना मला तोडून-मोडून फेकणारा? तू मला तोडलंस आणि पाहा, मी झालोय कृष्णबासरी! अवघं वृंदावन डोलवण्याची ताकद आहे माझ्यात आज!! तुझा एक एक घाव जरी मला संपवण्यासाठी होता तरी नव्याने मला माझ्याच दगडात माझ्याच हक्काचा देव सापडत होता त्यातून.. …Read more »

तेरा नाम

लफ़्ज़ अटक-अटकके आते है इन दिनों ख़यालात बिखरतेसे जा रहे है बदमाश बदली चिढ़ाती है तेरा नाम ले-लेके दिलके दोशमें उलझसा जाता हूँ मैं तब.. तब वहीं तेरा नाम खुद एक नज़्म बनके चलता है मेरे साथ सुलझाता है वह खयालोंके धागे, जो अस्तव्यस्त पडे रहते है किसी सुर्ख़ जगह.. ऐसी जगह, जहा ना सुरज होता है उपर ना पाँवोंतले ज़मीं बस यहीं सोचके रह जाता हूँ मैं की – यह किस नदीमें बहता चला जा रहा हूँ मैं, ना हाथमें पतवार है, ना बहावको कोई दिशा साथ है तो बस इक तेरे नामकी खुशबू जो खींचके ले जा रही …Read more »

जीवन त्रिविष्टप था..!!

Song : Ennodu Nee Irundhaal Music : A. R. Rahman Singers : Sid Sriram, Sunitha Sarathy Film : I/Ai The following is not a translation, but an independent song written by me on the tunes of “Ennodu Nee Irundhaal” & convey the same feel as the original song. You can call it as a ‘Hindi Cover Version’ पंख तो थे खोले उसने पर वो अपनेही ख्वाबोंसे जल गया हाँ.. उडने चला था वो पर टूटा.. गिर गया.. दिलका पंछी मरता रहा, इतनाही बस कहता रहा.. जीवन त्रिविष्टप था, नर्क बना है जो तेरे बिन! हो, सजनी रे अब ऐसे जीना …Read more »

पुराना ज़ख़्म

बडे झुलसे-झुलसेसे मौसम है धधक रही है धूप और छाँवभी ये तू है या फिर तेरे ख़यालोंकी तपिश, तुम्हें सोचता हूँ तो जल जाता हूँ अपनेही तापसे मैं गल जाता हूँ कितने अँधियारे है काटें इक उजालेकी आस में कितने सैय्यार निगल गया हूँ बस एकही साँस में ये तू है या तेरे वजूदकी परछाई, इक आहटहीसे बल खाता हूँ डूबता सूरज हूँ ढल जाता हूँ कितनी बार फूँके है यादोंके रिसालें कितनी बार फिर उन्हें बनाया है ये तू है या इन खँडहरोंसे गुज़रा झौंका कोई, इक छुअनहीसे सील जाता हूँ पुराना ज़ख़्म हूँ खिल जाता हूँ तुम्हें सोचता …Read more »

मेरे राम कहाँ..?

आहत क्रौंचकी किलकारी, निषादका आखेट है जारी पायसदान पानेको तरसे, कौसल्याके प्रियकाम कहाँ? राम कहाँ, मेरे राम कहाँ? कैकेयी हर घर सन्निद्ध है दशरथ फिरभी वचनबद्ध है लक्ष्मणके प्यारे परंतु, ऋषियोंके आराम कहाँ? राम कहाँ, मेरे राम कहाँ? दण्डकारण्य आजभी हतबल दैत्य राज करते है प्रतिपल शीला बनके पंथ निहारे, अहल्याके उपशाम कहाँ? राम कहाँ, मेरे राम कहाँ? वाली-सुग्रीव भेद चला है सच्चा था वोही जला है संजीवनी लानेको निकले, हनुमतके श्रीराम कहाँ? राम कहाँ, मेरे राम कहाँ? रावणकाल वर्तमान भयंकर घुटता बिभीषण यद्यपि धुरंधर अशोकवनमें वैदेही व्याकुल, पुकारती निजधाम कहाँ? राम कहाँ, मेरे राम कहाँ? लव-कुशतो बिछडेही रह गए …Read more »

चेहरे

ख्वाबतले कुचले चेहरे देखे है बिनबातके उजले चेहरे देखे है छोडके रिवायत देखा जो मैंने, अपनेही आप जले चेहरे देखे है चेहरे चलते है चाल, जीतते भी है बाज़ी, जीतनेवाले चेहरोंपे लेकीन, घाँव गहरे देखे है! चिपकाके चेहरेपर चेहरा, उसको ही वजूद बताते है, पौनीरातमें उसके सैंकडों, टुकडे बिखरे देखे है! चेहरे खाली कैनवास, चेहरे रंगोंका गोदाम है, आँखोंकी ब्रशसे झाडो तो, वीराँ जझीरे देखे है! — © विक्रम. (www.vikramedke.com)

लाम नहीं मिलता

फ़ुर्क़तकी रातका रंग देखा है कभी? काला काला सा होता है.. गाढा.. स्याह.. फिर नदी बन जाती है उसकी और बहता रहता है उसमें, जबींपे काला टीका लगाया नब़ी, चाँद थामें एक हाथमें, तो दूजेमें जलता दिल! जलता दिल, जो चाँदसे कहीं ज़्यादा रौशनी देता है.. और सुरजसे कहीं ज़्यादा आँच! नब़ी ताँकता रहता है उस उजालेमें हरइक मोड़ की इस दर्यामें कोई तो मोड़ होगा, जो फ़ारसीका तालिब हो, जो पहचानता हो लामको लाम नहीं मिलता, दिल नहीं बुझता, चाँद नहीं ढलता, रात फ़ुर्क़तकी, और गाढ़ी होती चली जाती है..! — © Vikram Edke [ www.vikramedke.com ]

माझ्या मना..

सकाळचा हिंसाचार सायंकाळच्या तांडवापुढे क्षुल्लक वाटू लागतो उद्दाम अनौरस अंधार तेवढा रात्रंदिन जागतो अरे अंधारातच तर जगायचंय आपल्याला, कारण उजेडासाठी गरजेची असते आग! तेव्हा माझ्या मना स्वस्थ राहा, येऊ देऊ नकोस राग!! आग लागण्यासाठी जाळावा लागतो जीव आणि षंढा, तुला तर नुसत्या विचारानेच भरते हीव त्यापेक्षा सोपे मेणबत्ती जाळणे, निरुपद्रवी जिची आग! माझ्या मना स्वस्थ राहा, येऊ देऊ नकोस राग!! ते येतात मुडदे पाडतात, आणि आम्ही पाडतो मुद्दे ‘दहशतवादाला धर्म नसतोच मुळी’, मग कितीही बसू देत गुद्दे गुद्दे खा, मस्त राहा, फारफार तर बन सेक्युलरी नाग! माझ्या मना स्वस्थ राहा, येऊ देऊ नकोस राग!! अरे मृत्यू कुणाला चुकलाय, मग त्यांनी …Read more »

मंथन

उठता ज्वार एवं गिरते रत्न मैं ज्येष्ठ या तू कनिष्ठ – हठधर्मी प्रयत्न कभी मदिरा का नि:सारण तो कभी मदिराक्षी का उत्थान जो अधिक से अधिक समेटें, बस वोही महान विचार ये अभेद्य है, हारा सो दैत्य है मेरूसे लिपटा वासुकी किन्तु, क्षरता सुनित्य है कौई पचाएगा हालाहल और कौई अमृत पाएगा नींवमें स्थापित कूर्म, पिसता है पिसता जाएगा लक्ष्मी वरेगी उसीको जिसके गलेमें तुलसीहार है देव निश्चिंत है की उनका पक्षधर अमृत-कहार है न्याय क्या अन्याय क्या, सब दृष्टी का भेद है कहा ले जा रहा है ये मंथन सबको, सोचा तो खेद है! सोचा तो खेद है!! — …Read more »