Category: Poetry

  • क्रिएटिविटी की बूँदें

    परेशानियाँ बो के जब उधेड़ोगे नीन्दें,
    तब जा कर बरसती है दो-चार क्रिएटिविटी की बूँदें!
    टप्प कर के गिरती है कुछ,
    और कुछ कँकर सी सटाक लगती है,
    अाधे जल रहे दिल से लग के भाँप भी बन जाती है कोई!
    एक-आध बच भी जाती है कुछ,
    तो वह भी हम मोबाईल, लैपटाप या टिवी के पराश्राव्य शोर से मार देते है!
    और फिरते रहते है भौकाल बन के बाकी बचा कुछ-एक हज़ारवाँ भाग सहलाते हुए!
    कि देखो, मैं ने कितना ऑफबीट कर दिया यह!
    अरे भाई, देने वाले ने क्या दिया था, तू ने कितना लिया है!
    छप्पर तो खैर फटा ही था, तू ने झोला भी तो फाड दिया है!!
    न रिऐलिटी के रहे, न मटेरिऐलिटी के रहे,
    इन्सानियत के चक्कर में हम तो बस इन्सैनिटी के रहे!
    आगे है फिर वही डिप्रैशन फिर वही अवसाद,
    वहीं रोज़ परेशानियाँ बोना वहीं नीन्दें उजाड!
    सह सह के गुबार भर आता है कभी,
    तब फिर से होती है दो बूँद क्रिएटिविटी की बरसात!!

    — © विक्रम श्रीराम एडके
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  • वादा

    (धुन: इरऽविन्ग तीऽवाय. फिल्म: 96. संगीत: Govind Vasantha)

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    हक़ीक़त से कैसे साझा करे
    नयनों में तैरे सपने
    समय से क्या हम वादा करे
    दो ही मिले थे लम्हें
    रैना ले के चाँद के निशाँ
    बहती चली है और ही दिशा
    भोर ने है उस का आँचल यह भरा
    चाँद के है हिस्से में काली ख़ला
    फिर भी क्यूँ ना आह वह भरे
    हक़ीक़त से कैसे साझा करे
    नयनों में तैरे सपने

    एक आँच थी मेरा जीवन पिघला गयी
    एक बाँसुरी नयी सरगम सिखला गयी
    यूँ तो उम्र भर मैं थी भागी जिस के लिए
    थी वह कस्तुरी मेरे दो जग महका गयी
    ना मोह ना ही कोई भी है शिकवा अब
    दिल था दिल है और है बहता दरिया

    कदम-कदम मैं याद बन के साथ साथ आऊँगा
    उदास सी हो जाओगी तो गीतों से मनाऊँगा
    तू नूर की नदी है तेरा ज़िक़्र भी तो नूर है
    पपीहा बन के था जिया मैं पपीहा बन के गाऊँगा
    सही-ग़लत के दायरे है जिस्म के लिबास पे
    मैं पार की बहार में यूँ रूह से पुकारूँगा तुझ को
    तू आ जा ना..

    — © विक्रम श्रीराम एडके
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    टीप: यह अनुवाद या भाषांतर नहीं, अपितु फिल्म में चित्रित प्रसंग एवं संहिता को ध्यान में रखते हुए लिखा गया एक स्वतंत्र गीत है । जिन्होंने फिल्म देखी है, वह इस गीत से कदाचित अधिक संबद्ध हो पाएँगे, किंतु आशा है की औरों को भी यह उतना ही भाएगा ।

  • वृत्तावर्त

    सुरज ढलता है तो,
    और जग में जलता है वह,
    अस्त-उदय खेल है यह भेद बुद्धी का!
    मृत्यू ध्रुव है तो,
    जन्म भी तो ध्रुव होगा,
    जनन-मरण चक्र है यह भेद दृष्टी का!
    अमावस के पीछे पौर्णिमा,
    कालिमा के आगे रक्तिमा,
    वृत्तावर्त से बना है भवसमुद्र सारा!
    धानानानानानाना..!!

    अधर्म के मार्ग पुष्प उगते,
    धर्ममार्गपर है शूल चुभते!
    पाप को चाहे यदि तजना,
    पुण्य की भी रस्सी क्यूँ ना छोडे!
    पाप क्या क्या धर्म (मुद्रा),
    पुण्य क्या अधर्म (के आयाम),
    एक को हम जो दे (मिटा किंतु),
    मुद्रा तो तब भी घूमेगी ना!
    धानानानानानाना..!!

    — © विक्रम श्रीराम एडके ।

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    चित्रपट: विक्रम-वेधा
    गीत: करप्पऽ वेळ्ळई
    गीतकार: विघ्नेश शिवन
    संगीत: सॅम सी. एस.
    गायक: शिवम, सॅम सी. एस.

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    धुन के लिए गीत की लिंक: https://youtu.be/4AYAcFcFu84

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    साल २०१७ की फिल्म “विक्रम-वेधा” मेरी सब से प्रिय फिल्मों में से एक है । इस फिल्म ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर ही झण्डे गाडें, अपितु एक रोमहर्षक गाथा को कैसे पुराणकथा के वस्त्रों में सँजोकर दर्शाया जाए, इस विषय में मानदंड भी स्थापित किए । फिल्म का संगीत भी खूब चर्चा में रहा । सॅम सी. एस. द्वारा संगीतबद्ध सारे गीत और पार्श्वसंगीत जबरदस्त हिट सिद्ध हुए । इन्हीं में से एक गीत, जिसे हर श्रोता ने ह्रदयपूर्वक सराहा, वह था विघ्नेश शिवन की लेखनी से उतरा तथा शिवम एवं सॅम सी. एस. का गाया हुआ, “करप्पऽ वेळ्ळई” । “करप्पऽ” का अर्थ होता है “काला” तथा “वेळ्ळई” यानी की “श्वेत” । अर्थ एवं ऊर्जा से भरा यह गीत प्रवृत्तीयों के बीच विरोधाभास दर्शाता है, जो कि फिल्म के विषयों में से भी एक है । पूरे गीत का अर्थ तो मैं नहीं जानता, किंतु उस के पीछे का विचार मेरे मन में घर कर गया । और मैं ने लिख डाला उसी धुन पर, उसी विषय को दर्शाता बिल्कुल नया गीत, “वृत्तावर्त” । स्वान्तसुखाय है, न कि किसी फिल्म के लिए । मैं पुनः एक बार स्पष्ट कर दूँ कि यह अनुवाद नहीं बल्कि एक पूर्णतः नया गीत है, हालाँ कि विषय वही है । पढिए और बताईए यह प्रयत्न आप को कैसा लगा ।

  • लढ मित्रा

    डरतो कश्याला तू लढ मित्रा
    लढत्याची दासी धरणी मित्रा

    दु:ख तितुके माया हो
    सूर्य गिळतो छाया हो
    टाकीच्या घावांमधुनी
    देव बनते काया हो
    वेदना रे वीराला
    लिहिली असे जन्माला
    वेणांची करुनि गीते
    गा तू आपुल्या कर्माला
    तुझिया रे कष्टांनी हो अवनिला आधारा
    तू बांध माथ्यावरती जखमांचा हा भारा
    व्रण हे जरी भीषण रे
    युद्ध वीरा भूषण रे
    तू पार्थ तुझा तू कृष्ण तुझा तू तुझी गीता रे
    होतील कविता ह्या तलवारी
    देतील अंधारा त्या ललकारी

    डरतो कश्याला तू लढ मित्रा
    लढत्याची दासी धरणी मित्रा

    गंध मातीचा येण्या
    चार महिने ताप हो
    तपाचे फळ मिळण्या
    पाहावी लागते वाट हो
    शंभरवेळा पडताना
    शंभरवेळा जो उठतो
    त्याचीच होते सरशी
    जुळण्यासाठी जो तुटतो
    असू दे किती जरी उन्नत हिमवंताचा माथा
    धीराच्या पदचिन्हांकित विजयाच्या या गाथा
    ध्येय असे ह्रदयात
    बदले हार विजयात
    हे मर्म असे रण कर्म असे हा इतिहासच आहे
    होतील कविता ह्या तलवारी
    देतील अंधारा त्या ललकारी

    डरतो कश्याला तू लढ मित्रा
    लढत्याची दासी धरणी मित्रा

    — © विक्रम श्रीराम एडके
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    चाल: ओव्वोरु पूकळुमे (ऑटोग्राफ)
    राग: सिंधुभैरवी
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  • कधी कधी

    कधी कधी रात्र विरताना,
    दिवस उगवायाचा असतो अजून,
    सूर्य उमलायाचा असतो अजून!
    चंद्राचं इंधन पुरतं संपलेलं नसतं आणि
    लुकलुकत असतात ताऱ्यांचे लाखो पलिते,
    क्षितिजचुंबी गगनाच्या लाक्षागृहात!
    कुणीतरी साखरझोपेत कूस बदलतो,
    कुणाची मिठी घट्ट होते
    कुठे कुरकुरत असतो पंखा तर
    कुठे स्वप्नांची होडी पैल होते!
    अश्या एकाकी अंधारवेळी
    मी टक्क जागा असतो,
    कधी सुटलेले हात आठवत,
    तर कधी मिटलेली दारे साठवत!
    तू विचारलं होतंस, ‘विसरणार तर नाहीस ना मला’
    आणि ‘मला विसर, माझं लग्न ठरलंय’,
    हेदेखील तूच म्हणाली होतीस!
    मला तेव्हाही उत्तर सुचलं नव्हतं,
    मला तेव्हाही उत्तर सुचलं नाही!
    त्या एकांत प्रहरी मात्र,
    सुचत राहातात सारीच न दिलेली उत्तरे,
    आणि त्यावरच्या न आलेल्या प्रतिक्रिया!
    थेंब थेंब झरणारे चांदणे आटत जाते
    आणि रात्रही लागलेली असते सरू,
    पण दिवस उगवायाचा असतो अजून,
    सूर्य उमलायाचा असतो अजून,
    कधी कधी रात्र विरताना!

    — © विक्रम श्रीराम एडके
    (www.vikramedke.com)

  • गुलज़ार

    नज़्म पूरे जोबन पे थी
    नूर के कोहरे बहते थे
    इश्क़ तो तब भी था मगर
    वह और जगह रहते थे

    चलते-बहते एक रात
    सय्यार टकराया चाँद से
    नूर मिला नज़्म को जा कर
    अब्रों की दिवार फाँद के

    सागर डोल गया था उस दम
    तारे सारे उफनने लगे थे
    दूर कहीं कोहसारों में
    ख़्वाब पकने बनने लगे थे

    वक़्त थम गया था उस वक़्त
    नज़्म-ओ-नूर का दीदार हुआ
    इक हलचल सी हुई उजालों में
    इक नाम उठा ‘गुलज़ार’ हुआ

    — © विक्रम श्रीराम एडके
    Gulzar #HBDGulzarSaab

  • ख़याल

    कई दफ़ा खयाल, बयाँसे ज्यादा खुबसुरत होते हैं,
    और हर इक बयाँ के पीछे होते हैं सैकडों मुर्दा ख़याल!
    नज़्मोंकी तआरीफ करते हैं लोग, ख़यालोंके नआले कौन सुनता हैं?
    फूटे अल्फ़ाज़, चीखते ख़यालोंसे ज्यादा भाते हैं शायद!!
    ऐ मेरे ख़याल, ऐ मेरी कल्पना..
    इक तुम्हींपे तो लिखता हूँ मैं नज़्में,
    बयाँ करता हूँ तुम्हारा हुस्न, जो पकडमें नहीं आता,
    फिसल जाता हैं..
    सच कहता हूँ..
    मेरी नज़्मोंसे कहीं ज्यादा खुबसूरत हो तुम, जँचती हैं वह तुमसे!
    इक तुम्हाराही तो आसरा हैं उन्हें..
    वरना नज़्मोंका क्या हैं..
    उडते परीन्दे हैं महज, ना कोई ठिकाना – ना कोई आशियाँ..!

    — © विक्रम.

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  • वैनतेय

    काल तू मला मारलं होतंस ना,
    पाहा आज मी पुन्हा उभा राहिलोय!
    तू करुन टाकलं होतंस छिन्नविच्छिन्न मला,
    मी ते सगळे तुकडे गोळा केले
    आणि सांधलंय बघ हे देहभर आभाळ!
    आजपासून इथे बरसतील केवळ असण्याचेच मेघ,
    होय मी आहे अजूनही, मी आहे आणि मी राहाणार,
    मी असलो आणि नसलो तरीही नेहमीच तुझ्या अपराधगंडाने सडलेल्या मनात,
    मी राहाणार!
    कारण.. कारण, तूच तर होतास ना मला तोडून-मोडून फेकणारा?
    तू मला तोडलंस आणि पाहा, मी झालोय कृष्णबासरी!
    अवघं वृंदावन डोलवण्याची ताकद आहे माझ्यात आज!!
    तुझा एक एक घाव जरी मला संपवण्यासाठी होता तरी नव्याने मला माझ्याच दगडात माझ्याच हक्काचा देव सापडत होता त्यातून..
    कशी झळाळून उठलीये माझी मूर्ती नाही?
    पण तू मला जाळलंस..
    तू मला जाळलंस आणि पाहा तरी, मी स्वतःच बनलोय एक अग्निकंकण!!
    वेड्या, तुझ्या क्षुद्र स्वार्थापायी माझी राख-राख करताना एक गोष्ट पार विसरुन गेला होतास तू अरे..
    की सगळ्याच राखेतून फिनिक्स उभे राहात नसतात काही!
    काही काही राखेतून वैनतेयसुद्धा जन्माला येत असतो!!

    — © विक्रम श्रीराम एडके
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  • तेरा नाम

    लफ़्ज़ अटक-अटकके आते है इन दिनों
    ख़यालात बिखरतेसे जा रहे है
    बदमाश बदली चिढ़ाती है तेरा नाम ले-लेके
    दिलके दोशमें उलझसा जाता हूँ मैं तब..
    तब वहीं तेरा नाम खुद एक नज़्म बनके चलता है मेरे साथ
    सुलझाता है वह खयालोंके धागे, जो अस्तव्यस्त पडे रहते है किसी सुर्ख़ जगह..
    ऐसी जगह, जहा ना सुरज होता है उपर ना पाँवोंतले ज़मीं
    बस यहीं सोचके रह जाता हूँ मैं की –
    यह किस नदीमें बहता चला जा रहा हूँ मैं,
    ना हाथमें पतवार है, ना बहावको कोई दिशा
    साथ है तो बस इक तेरे नामकी खुशबू
    जो खींचके ले जा रही है दूर कहीं
    शायद उस पार ख़ुदा होगा
    शायद उस पार तुम होगी
    या फिर शायद तुम दोनोंही होंगे उस पार
    कहीं तुम दोनों एकही तो नहीं?

    — © विक्रम श्रीराम एडके
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  • जीवन त्रिविष्टप था..!!

    Song : Ennodu Nee Irundhaal
    Music : A. R. Rahman
    Singers : Sid Sriram, Sunitha Sarathy
    Film : I/Ai

    The following is not a translation, but an independent song written by me on the tunes of “Ennodu Nee Irundhaal” & convey the same feel as the original song. You can call it as a ‘Hindi Cover Version’

    पंख तो थे खोले उसने पर
    वो अपनेही ख्वाबोंसे जल गया
    हाँ.. उडने चला था वो पर
    टूटा.. गिर गया..
    दिलका पंछी मरता रहा, इतनाही बस कहता रहा..
    जीवन त्रिविष्टप था, नर्क बना है जो तेरे बिन!

    हो, सजनी रे अब ऐसे जीना नामुमकिन है
    कौन हूँ मैं, क्या हूँ मैं, कहना भी मुश्क़िल है
    मैं द्यु तू पृथिवी यह तय है, पर ओ पिया
    राम और सिया को भी तो जगने जुदा किया था
    जीवन त्रिविष्टप था..

    बिरहा भीनी रातोंमें
    कितनी यादें सुलगती है,
    चाँद सिरहाने रखा तो
    अन्तर्मन तक जलती है
    दो दो चंदनी आँखोंका
    मुझको टोणा लग जाए,
    जीनेकी परवाह ही क्या
    मरना कुन्दन हो जाए

    साँसे दिलासे ना देती है सनम
    जबसे तुमको खोया, खोए हमसे हम
    अब तो हर पल ऐसा हाल है
    तुझ बिन लम्हें, सौ-सौ साल है
    जीवन त्रिविष्टप था, नर्क बना है जो तेरे बिन!

    — © विक्रम श्रीराम एडके.
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