क्रिएटिविटी की बूँदें

Written by

in

परेशानियाँ बो के जब उधेड़ोगे नीन्दें,
तब जा कर बरसती है दो-चार क्रिएटिविटी की बूँदें!
टप्प कर के गिरती है कुछ,
और कुछ कँकर सी सटाक लगती है,
अाधे जल रहे दिल से लग के भाँप भी बन जाती है कोई!
एक-आध बच भी जाती है कुछ,
तो वह भी हम मोबाईल, लैपटाप या टिवी के पराश्राव्य शोर से मार देते है!
और फिरते रहते है भौकाल बन के बाकी बचा कुछ-एक हज़ारवाँ भाग सहलाते हुए!
कि देखो, मैं ने कितना ऑफबीट कर दिया यह!
अरे भाई, देने वाले ने क्या दिया था, तू ने कितना लिया है!
छप्पर तो खैर फटा ही था, तू ने झोला भी तो फाड दिया है!!
न रिऐलिटी के रहे, न मटेरिऐलिटी के रहे,
इन्सानियत के चक्कर में हम तो बस इन्सैनिटी के रहे!
आगे है फिर वही डिप्रैशन फिर वही अवसाद,
वहीं रोज़ परेशानियाँ बोना वहीं नीन्दें उजाड!
सह सह के गुबार भर आता है कभी,
तब फिर से होती है दो बूँद क्रिएटिविटी की बरसात!!

— © विक्रम श्रीराम एडके
[www.vikramedke.com]

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *