वृत्तावर्त

सुरज ढलता है तो,
और जग में जलता है वह,
अस्त-उदय खेल है यह भेद बुद्धी का!
मृत्यू ध्रुव है तो,
जन्म भी तो ध्रुव होगा,
जनन-मरण चक्र है यह भेद दृष्टी का!
अमावस के पीछे पौर्णिमा,
कालिमा के आगे रक्तिमा,
वृत्तावर्त से बना है भवसमुद्र सारा!
धानानानानानाना..!!

अधर्म के मार्ग पुष्प उगते,
धर्ममार्गपर है शूल चुभते!
पाप को चाहे यदि तजना,
पुण्य की भी रस्सी क्यूँ ना छोडे!
पाप क्या क्या धर्म (मुद्रा),
पुण्य क्या अधर्म (के आयाम),
एक को हम जो दे (मिटा किंतु),
मुद्रा तो तब भी घूमेगी ना!
धानानानानानाना..!!

— © विक्रम श्रीराम एडके ।

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चित्रपट: विक्रम-वेधा
गीत: करप्पऽ वेळ्ळई
गीतकार: विघ्नेश शिवन
संगीत: सॅम सी. एस.
गायक: शिवम, सॅम सी. एस.

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धुन के लिए गीत की लिंक: https://youtu.be/4AYAcFcFu84

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साल २०१७ की फिल्म “विक्रम-वेधा” मेरी सब से प्रिय फिल्मों में से एक है । इस फिल्म ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर ही झण्डे गाडें, अपितु एक रोमहर्षक गाथा को कैसे पुराणकथा के वस्त्रों में सँजोकर दर्शाया जाए, इस विषय में मानदंड भी स्थापित किए । फिल्म का संगीत भी खूब चर्चा में रहा । सॅम सी. एस. द्वारा संगीतबद्ध सारे गीत और पार्श्वसंगीत जबरदस्त हिट सिद्ध हुए । इन्हीं में से एक गीत, जिसे हर श्रोता ने ह्रदयपूर्वक सराहा, वह था विघ्नेश शिवन की लेखनी से उतरा तथा शिवम एवं सॅम सी. एस. का गाया हुआ, “करप्पऽ वेळ्ळई” । “करप्पऽ” का अर्थ होता है “काला” तथा “वेळ्ळई” यानी की “श्वेत” । अर्थ एवं ऊर्जा से भरा यह गीत प्रवृत्तीयों के बीच विरोधाभास दर्शाता है, जो कि फिल्म के विषयों में से भी एक है । पूरे गीत का अर्थ तो मैं नहीं जानता, किंतु उस के पीछे का विचार मेरे मन में घर कर गया । और मैं ने लिख डाला उसी धुन पर, उसी विषय को दर्शाता बिल्कुल नया गीत, “वृत्तावर्त” । स्वान्तसुखाय है, न कि किसी फिल्म के लिए । मैं पुनः एक बार स्पष्ट कर दूँ कि यह अनुवाद नहीं बल्कि एक पूर्णतः नया गीत है, हालाँ कि विषय वही है । पढिए और बताईए यह प्रयत्न आप को कैसा लगा ।

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