मंथन

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उठता ज्वार एवं गिरते रत्न
मैं ज्येष्ठ या तू कनिष्ठ – हठधर्मी प्रयत्न
कभी मदिरा का नि:सारण तो कभी मदिराक्षी का उत्थान
जो अधिक से अधिक समेटें, बस वोही महान
विचार ये अभेद्य है, हारा सो दैत्य है
मेरूसे लिपटा वासुकी किन्तु, क्षरता सुनित्य है
कौई पचाएगा हालाहल और कौई अमृत पाएगा
नींवमें स्थापित कूर्म, पिसता है पिसता जाएगा
लक्ष्मी वरेगी उसीको जिसके गलेमें तुलसीहार है
देव निश्चिंत है की उनका पक्षधर अमृत-कहार है
न्याय क्या अन्याय क्या, सब दृष्टी का भेद है
कहा ले जा रहा है ये मंथन सबको,
सोचा तो खेद है! सोचा तो खेद है!!

— © विक्रम श्रीराम एडके
[ www.vikramedke.com ]

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