जिंदगीकी ढलानपे सुलगती दिवानगी पीछे छोड दी हैं मैंने

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जिंदगीकी ढलानपे सुलगती दिवानगी पीछे छोड दी हैं मैंने
कहीं मेरे जलते, सुलगते ख्वाब पिघला ही न दें इस ढलान को, वो मुझे रौंदनेसे पहले!
या फिर मैं ही न कुचल दूँ इस ढलानको नझ्मोंके बोझसे..
जिंदगीकी ढलानपे सुलगती दिवानगी पीछे छोड दी हैं मैंने..!
के यकीं नहीं मुझे मैं टूँट जाऊँगा अबकी बार,
डर इस बातका हैं की गिरनेके बाद फिर कोई नई ढलान तो मेरा इंतजार नहीं कर रही होगी?
डर गिरनेका नहीं, डर टूटनेका नहीं, डर इस “गिरते रहने”से लगता हैं..
जिंदगीकी ढलानपे सुलगती दिवानगी पीछे छोड दी हैं मैंने..!
– © विक्रम.

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