आहत क्रौंचकी किलकारी,
निषादका आखेट है जारी
पायसदान पानेको तरसे,
कौसल्याके प्रियकाम कहाँ?
राम कहाँ, मेरे राम कहाँ?
कैकेयी हर घर सन्निद्ध है
दशरथ फिरभी वचनबद्ध है
लक्ष्मणके प्यारे परंतु,
ऋषियोंके आराम कहाँ?
राम कहाँ, मेरे राम कहाँ?
दण्डकारण्य आजभी हतबल
दैत्य राज करते है प्रतिपल
शीला बनके पंथ निहारे,
अहल्याके उपशाम कहाँ?
राम कहाँ, मेरे राम कहाँ?
वाली-सुग्रीव भेद चला है
सच्चा था वोही जला है
संजीवनी लानेको निकले,
हनुमतके श्रीराम कहाँ?
राम कहाँ, मेरे राम कहाँ?
रावणकाल वर्तमान भयंकर
घुटता बिभीषण यद्यपि धुरंधर
अशोकवनमें वैदेही व्याकुल,
पुकारती निजधाम कहाँ?
राम कहाँ, मेरे राम कहाँ?
लव-कुशतो बिछडेही रह गए
अवधवासी अनृतमें बह गए
धरती फटनेपरभी लेकिन,
हमको तो विश्राम कहाँ?
राम कहाँ, मेरे राम कहाँ?
— © विक्रम श्रीराम एडके
[www.vikramedke.com]

Leave a Reply