Category: Poetry

  • वाकियात

    वाकियात

    Javaan- Vikram Edke
    Javaan- Vikram Edke

    चँद कंचोंकी आवाज हुई बस,
    फिर खेल सारा बिखर गया!
    पंछी उड गये पेडोंसे और,
    माँ का दामन सिहर गया!!

    सफेद बर्फपे गिरे थे जो,
    वो स्याह खूनके छींटें थे!
    फर्जकी खुशबू थी जिनमें,
    वो आँसू बडे ही मीठे थे!!

    गुजर गये थे मौसम यूँ ही,
    सावन सारे रुठे थे!
    ‘लौट आऊँगा प्रिये’, कहा था जिनमें
    वो वादे सारे झूठे थे!!

    परसोंही जन्मे बच्चेका उसने,
    मुख भी अब तक देखा न था!
    बूढे पिताके चरणोंमें, सुना हैं,
    कई दिनोंसे मथ्था टेका न था!!

    नेता मस्त थे घोटालोंमें,
    आवाम चैनसे सोया था!
    बस धरतीका सीना उस दिन,
    चुपके चुपके रोया था!!

    न बातोंमें चर्चा था कोई,
    न न्यूजमें थी कोई हरारत!
    वैसेभी इन बातोंकी,
    उसको कब कहाँ थी चाहत!!

    ‘कडी निंदा’के दौरे पडे बस,
    श्रद्धांजलीकी भाषा थी!
    कहनेवालेकी आँखोंमें लेकीन,
    झूठे ‘अमन की आशा’ थी!!

    कुल मिलाके वोही हुआ था,
    जिसकी रोज हमें हैं आदत!
    सबकुछ मझेमें चल रहा हैं अपना,
    सीमापे जवान मरा था शायद!!

    – © विक्रम.

  • उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य-वरान्निबोधत!!

    The track “Nenje Ezhu” from Maryan is one of my favorite songs. It’s great music & soulful voice of none other than A.R. Rahman inspired me so much that I decided to write a Hindi poem on this tune. So, here is my take on this song. This is not a translation but an independent poetry conveying the meaning of the song. I’ve taken the poetic-freedom of incorporating many concepts from the holy Katha-Upanishada (“Awake, Arise.. & stop not till the goal is achieved”!! – Katha/1.3.14; Apparently the favorite quote of Swami Vivekananda!) & the Bhagawad-Geeta (“Nainam Chhindati Shastrani – Geeta/2.23) in it. I’ve taken the reference of great martyr Sage Dadhichi also. So, in a way, this one is quite different – more universal – from the original Tamizh version, as it is not bound with the situation of the movie.

    Do tell me how do you like it.


    [Note: This poetry is a copyrighted work & author’s permission is necessary before any kind of reproduction of it.]


    Song – Nenje Ezhu
    Music & Singer – A.R. Rahman
    Film – Maryan

    “अंतर्द्वंद्वकी राहोंमें,
    अथाह, कराल प्रवाहोंमें,
    अग्निग्रसित दिशाएँ हो,
    कण्टकस्तंभ धराएँ हो,
    सूर्यभी यदि शर उगले,
    तुझे तबभी चलना हैं..
    उत्तिष्ठत (६),
    जाग्रत, प्राप्य-वरान्निबोधत!!

    मार्गरोधी चट्टानोंको,
    कर दे परास्त आह्वानोंको!
    “नैनं छिन्दति शस्त्राणि”
    भय कैसा फिर प्राणोंको?
    इस गीतार्थको प्राशन कर,
    तुझे आगे बढना हैं..
    उत्तिष्ठत (६),
    जाग्रत, प्राप्य-वरान्निबोधत!!

    जो सहता वोही जाने होती हैं कैसी वेदना,
    पर यारा, जीवन तो अस्तोंसे उभरी चेतना!
    तू वंशज दधिचीका, हैं वज्र अस्थियोंमें,
    बस लड जा, तू फल का क्यूँ सोचे?
    उत्तिष्ठत (६),
    जाग्रत, प्राप्य-वरान्निबोधत!!

    अंतर्द्वंद्वकी राहोंमें,
    अथाह, कराल प्रवाहोंमें,
    वेलाभी जो दिखाई न पडें,
    तुझे तब भी चलना हैं..
    उत्तिष्ठत (६),
    जाग्रत, प्राप्य-वरान्निबोधत!!”

    – © विक्रम.

    [For those who have problem understanding such a hard, Sanskrit-alike Hindi, here is a line by line translation for you –

    “In the paths of inner-dilemma,
    In the endless, fierce streams,
    When there is nothing but fire in all the directions,
    When there are nothing but spikes on the roads,
    When even the sun shoots you with the arrows of heat,
    You still have to walk..
    Awake, Arise.. & stop not till the goal is achieved!!

    To every rock that is hurdle for you,
    & destroy each & every challenge in front of you,
    ‘No weapon can kill the Aatman’
    Then what is the fear to your soul?
    Grasping this moral of Bhagawad-Geeta,
    You have to go ahead & ahead..
    Awake, Arise.. & stop not till the goal is achieved!!

    He who suffers, only knows how it pains,
    But O dear friend, this is life & it rises from where it sets only!
    O mighty warrior, you are the descendent of Sage Dadhichi & have the Thunderbolt in your bones like him,
    Go & just fight your battle, why should you think about its consequences?
    Awake, Arise.. & stop not till the goal is achieved!!

    In the paths of inner-dilemma,
    In the endless, fierce streams,
    Where you cannot see the shore too,
    You still have to walk..
    Awake, Arise.. & stop not till the goal is achieved!!”

    – © Vikram.]

  • बहुत याद येते..!

    जेव्हा जेव्हा अवचित बरसात येते,
    माझ्या पागल दिलाला तुझी, बहुत याद येते..!

    माझ्या पागल दिलाची कहाणी, सांगू मी कुणा?
    रोजच सताविती मजला, या दग्ध प्रीतिखुणा!
    जेव्हा जेव्हा अलवार अशी चांदरात येते,
    माझ्या पागल दिलाला तुझी, बहुत याद येते!

    माझ्या पागल दिलाची कहाणी, ऐकूनी ये साजणी
    गूज तुझेही उमटू दे आता, माझ्या अवखळ मनी!
    जेव्हा हलके संध्या धरेला कुर्निसात देते,
    माझ्या पागल दिलाला तुझी, बहुत याद येते!

    बहुत याद येते!
    बहुत याद येते!

    – © विक्रम.

  • खुदा

    तुफाँ उफनता पानी था
    इक तु ही मेरा मानी था
    रात की चौखट पे जलता
    तु ही दिया आसमानी था!

    तुझसेही चलना सीखा मैंने
    तू इन पैरोंकी रवानी था
    घाट-घाटपे जिसे साधू गायें
    तु वो किस्सा-कहानी था!

    उलझनोंसे जूझा तब मैं जाना
    तू हर मुश्किलमें आसानी था
    सायेने भी छोडा था साथ मेरा
    तु अनाहत मेरा सानी था!

    – © विक्रम.

  • ये बात क्यूँ ना समझूँ मैं..?

    दिन आये रात आये, सदियाँ चाहे बीती जाये,
    बुलबुले बने और फूटें, समंदर अडिग लहराता जाये..!
    समंदर सत्य बुलबुला मिथ्या, ये बात क्यूँ ना समझूँ मैं?
    तू बनाये तू बिगाडे, ये बात क्यूँ ना समझूँ मैं?
    देवा, क्यूँ ना समझूँ मैं..?
    सपनोंकी माला तोडके, तू नये मोती हैं जोडता..
    मैं देखूँ टूटी माला, वो मोती क्यूँ ना देखता..!
    मेरा सँवारना भी बिगाडना, ये बात क्यूँ ना समझूँ मैं?
    तेरा बिगाडना भी सँवारना, ये बात क्यूँ ना समझूँ मैं?
    देवा, क्यूँ ना समझूँ मैं..?
    मैं राहके पत्थरोंपर शीश जो नमाता जाऊँ,
    क्यूँ इन्सानी चेहरोंमें मैं सूरत तेरी ना देख पाऊँ..!
    राह, राही, मंझिल तूही, ये बात क्यूँ ना समझूँ मैं?
    खुद, खुदतक चलके, खुदको हैं पाना, ये बात क्यूँ ना समझूँ मैं?
    देवा, क्यूँ ना समझूँ मैं..?
    – © विक्रम.
    (अहमदनगर येथील श्रीविशालगणपती मंदिरात सुचलेली कविता)

  • संग मेरे हमदम..!

    [There is a very beautiful song in “Kadal” called “Moongil Thottam” set on A. R. Rahman’s tunes & sung by Abhay Jodhpurkar/Harini.  This poem is on that tune. It is not a translation of the song but an original poetry conveying the mood of the song. The soul purpose is to capture the beautiful mood set by the song in Hindi (rather Hindusthani) language. If any group/band want to make a cover version of original song using these lyrics, kindly contact me as this work of poetry is protected by Bhaaratiya copyright laws. Enjoy the poetry & do give a feedback!]

    पू:
    हमने तुमको, जबसे चाहा,
    चाँद हैं जैसे आया ज़मींपर..
    सांसोंमें हैं, मीठीसी खलबल,
    इश्क नया हैं, ऐ दिल संभलकर..!
    संग मेरे हमदम, संग हैं जहाँ..
    ख़ुदा पास हैं तो दूरी कहाँ?

    स्त्रि:
    मैंने फ़लकपे, तेरा नाम लिखा,
    सारा आसमाँ, सुनहरासा हो गया..!
    पू:
    फूलोंपर कभी, ठहरे ओस तो,
    वो फूल तेरे, चेहरेसा हो गया..!
    स्त्रि:
    संग मेरे हमदम, संग हैं जहाँ..
    ख़ुदा पास हैं तो दूरी कहाँ?

    पू:
    महकी बारिशें, करती साजिशें,
    उसपे दिलमें, दहकीसी ख्वाहिशें..!
    स्त्रि:
    तुम  आवाज़ दो, तो परवाज़ हो,
    बहके परोंसे उडती हैं ख्वाहिशें..!
    संग मेरे हमदम, संग हैं जहाँ..
    ख़ुदा पास हैं तो दूरी कहाँ?

    © विक्रम.

  • रिश्ता

    कौन हूँ मैं तुम्हारा, और कौन हो तुम मेरी!
    खयालोंके कच्चे धागे, बस अहसासोंकी डोरी!!

    मैं एक मुसाफिर जरासा, तू शीतलसी हैं छाया!
    सौ अफसाने लिख दिये, किताब फिरभी अधूरी!!


    मैं चॉंद तांकता रहता हूँ, उसपार कहीं हैं गॉंव तेरा!
    बादलोकी कालीन बिछाओ तो जरा, के मिलना बडा जरूरी!!

    – © विक्रम

  • कसं जगायचं..?


    कसं जगायचं..
    तुजविण जीवन सूने, कसं जगायचं..?

    तुझ्या घरपासनं मी चकरा मारतोय रोज
    दिसशील तू कधीतरी ही आशा फुलते रोज
    मग दिसताच तू मला, मी खुदकन हसायचं
    पण नाहीच हे होणे, कसं जगायचं…?
    कसं जगायचं..
    तुजविण जीवन सूने, कसं जगायचं..?

    कॉलेजवरती कट्ट्यावरती विषय तुझाच मनी
    हळूच टिपतो डोळे जेव्हा बघत नाही कोणी
    येणाऱ्या प्रत्येकीत आता तू मला दिसायचं
    बघ फितूर झाले डोळे, कसं जगायचं…?
    कसं जगायचं..
    तुजविण जीवन सूने, कसं जगायचं..?

    कुठेच नाही लक्ष मी गर्दीत एकटा
    भिजून भिजून किती तरी माझा रुमाल कोरडा
    तिन्ही-त्रिकाळ तुलाच मी देवाकडे मागायचं
    पण नाहीच तो ही देणे, कसं जगायचं…?
    कसं जगायचं..
    तुजविण जीवन सूने, कसं जगायचं..?

    भेटणारच तू मला हे मला माहित आहे
    होणारच तू माझी हे मला ठाऊक आहे
    मग आपल्या नात्याचं रेशीम मी तेव्हा उलगडायचं
    पण तोवर कसले जगणे, कसं जगायचं…?
    कसं जगायचं..
    तुजविण जीवन सूने, कसं जगायचं..?

    – © विक्रम.

  • कौन हूँ मैं ये सोचता हूँ..!

    कौन हूँ मै ये सोचता हूँ,
    खयालोंके गुच्छे नोंचता
    हूँ! 
    अधमरे ख्वाब मेरे,
    सूखे पानी से सिंचता हूँ!!

    शायद अंगारा मैं बुझी आग का,
    अंदर ही अंदर जलता हूँ!
    नहीं मिलता जवाब फिरभी,
    मैं धुआँ धुआँ टटोलता हूँ!!

    मैं वहशी हूँ दरिंदा कोई,
    भागते साएँ दबोचता हूँ!
    फिरभी अपनेही कानोंमें,
    मैं बनके चीख गुँजता हूँ!!

    इन्साँ हूँ पागल मैं कोई,
    खुदको मिलनेसे डरता हूँ!
    मेरे अंदर हैं जो खुदा उसको,
    बाहर सजदे करता हूँ!!

    कौन हूँ मैं ये सोचता हूँ..!

    – © विक्रम.

  • तेरा चेहरा..!

    आंसू का एक क़तरा,
    आँखोंसे आज उतरा,
    याद आया जो, तेरा चेहरा..!

    नजरोंसे जो ओझल हैं तू,
    संगरीसी, बोझल हैं तू!
    अह्सासोंका बादल हैं तू,
    दर्दसे भी चंचल हैं तू!
    नजरोंके अह्सासोंका बादल आज पिघला,
    याद आया जो, तेरा चेहरा..!

    ग़मकी भी होती हैं एक खुशबू,
    सूँघता हूँ अब तो मैं हरसू!
    तेरी इक-इक सदाको मैं तरसू,
    अपनीही आँखोंसे अब मैं बरसू!
    ग़म ही की बाँटें खुशबू तेरा सूखा-सूखा गजरा,
    याद आया जो, तेरा चेहरा..!

    © विक्रम.